31 दिसंबर, 2009
नए साल में याद आया मकसद
2009 बड़ा अटपटा रहा ये साल... कुछ हासिल हुआ... और बहुत कुछ खोया... कई सपने पूरे हुए और कई बुने.. जिनपर काम चल रहा है... कई ऐसे दोस्त मिले जिनसे जिंदगी भर का साथ जुड़ गया... और कई पुराने दोस्त धीरे धीरे दूर हो गए... दोस्ती अभी भी है... लेकिन दूरिंया बड़ गई हैं... क्या पाया क्या खोया यही सोचने में साल दो हजार नौ का आखिरी दिन बीत गया... फिर एक पल ध्यान आया... कैसा होगा आने वाला साल... आगे की रणनीति बनाने के लिए मैने अपने दिमाग के सारे पेंच घुमा डाले... सोचा आने वाले वक्त में कुछ नया किया जाए... नया.... लेकिन क्या... फिर याद आई वो मासूम आंखे... ऑफिस से घर लौटते वक्त दो नन्हे से हाथ मेरी ओर बड़े... कहा गुब्बारे ले लो... मै हमेशा की तरह हंस दी... लेकिन जब मैने उस लड़की को दोबारा देखा तो उसकी पेट की भूख मुझे उसकी आंखों में नजर आई... मैने बिना सोचे फौरन उसे दस रुपए दिए... और उससे तीन गुब्बारे ले लिए... पैसे मिलने के बाद उसकी आंखों की चमक और चेहरे की हंसी ने मुझे राहत दी... हर बार अपने लिए ही जीती आई हूं... अपने से अलग अगर सोचा तो माता पिता, परिजनों या दोस्तों के बारे में... आज महसूस कर रही हूं... कि जिंदगी क्या है... और संघर्ष किसे करते हैं... मेरा भाषा में संघर्ष नौकरी करना... करियर बनाना... अपनी जरुरत की चीजें पूरी करना था... लेकिन वो नन्ही सी बच्ची बिन कुछ कहे मुझे संघर्ष का मतलब सिखा गई... और सिखा गई मेरी जिंदगी का मकसद...
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