
अरुणा.. ये नाम उसका है जो पिछले छत्तीस साल से केवल सांस ले रही है..उसे हम जिंदा नहीं कह सकते..बस सांसों ने अरुणा का अभी तक साथ नहीं छोड़ा है.. बाकी सभी रिश्ते नातों ने तो छत्तीस साल पहले ही अरुणा को अपनी जिंदगी से बेदखल कर दिया था.. दिन २७...महिना नवंबर...साल १९७३... और इसके बाद खत्म हो गई अरुणा की खुशहाल जिंदगी... एक अस्पताल में बतौर नर्स के तौर पर काम करने वाली अरुणा की अस्पताल के डॉक्टर के साथ शादी होने वाली थी.. लेकिन एक घटना और अरुणा की जिंदगी के सारे सपने बिखर गए... अरुणा से अस्पताल के ही सफाई कर्मचारी ने बलात्कार किया.. उस घटना का असर न ही केवल शारिरीक तौर पर बल्कि मानसिक रुप से भी इस कदर पड़ा.. कि अरुणा आज कुछ भी करने में सक्षम नहीं है.. कई सामाजिक संस्थाओं ने अरुणा को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ी.. लेकिन अरुणा के आरोपी को मिली तो महज सात साल की सजा.. छत्तीस साल की लड़ाई के बाद आखिरकार न्याय पाने की एक उम्मीद भी खत्म हो गई..और अब थक हार कर एक पत्रकार ने अऱुणा के लिए मौत मांगी हैं.. अरुणा एक जिंदा लाश की तरह है.. जिसे खुद के होने का भी एहसास नहीं.. न वो देख सकती है.. और न ही सुन सकती है.. अरुणा की हालत कमरे में रखे फर्नीचर के समान है.. बस फर्क है तो इतना कि अरुणा की सांसे अभी भी उसके साथ हैं.. अरुणा की इस हालत का जिक्र सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी किया गया है.. याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल प्रबंधन और महाराष्ट्र सराकर से अरुणा के स्वास्थ की रिपोर्ट मांगी है.. सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा.. इससे बड़ा सवाल ये है कि बलात्कार जैसे आरोपी के लिए सात साल की सजा उसके आरोपों के लिए क्या काफी थी? ये एक बड़ा सवाल है.. जरा सोच कर देखिए...

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