29 सितंबर, 2009

ये है आज की पत्रकारिता

मैं खबरों की दुनिया से हूं... हर रोज तमाम तरीके की खबरें हमारे पास आती हैं... कई ऐसी जो जबरन खबरें बनाई जाती हैं... और कुछ ऐसी जो केवल विज्ञापन होती हैं... लेकिन कई बार ऐसी खबरें आती हैं जो रिश्तों की पवित्रता को कंलकित कर जाती है... और कई ऐसी जो समाज का आइना दिखाती हैं... हर रोज ऐसी कई खबरें आती हैं... जिन्हें हम अंजाम तक पहुचाने की कोशिश करते हैं... लेकिन इन खबरों के फेर में हम भूल जाते हैं कि हम इसी समाज से हैं... हर उस घटना से जुड़े हुए हैं... जिन्हें हम लोगों के सामने परोसते हैं... खबरों के चक्कर में हम कई बार पत्रकारिता की मान मरियादा भूल जाते हैं... ऐसा कई बार नहीं बार बार होता है... हम बिना तह तक जाए ये फैसला कर लेते हैं कि ऐसा हुआ होगा... और क्यों हुआ होगा.. और यहां तक कि हम कई बार पुलिस का काम भी खुद कर लेते हैं.. और गुनाहगार तक पहुच जाते हैं... चाहे हकीकत में वो बेगुनाह क्यों न हो... हमारा काम खबर दिखाना होता है... दुनिया में हो रही गतिविधियों को जनता तक पहुचाना होता है... या यूं कहें कि सरकार और जनता के बीच की कड़ी पत्रकारिता होती है... लेकिन आज का पत्रकार ये भूल गया है... वो खुद ही मुल्जिमों को सलाखों के अंदर भेजने की कोशिश करता है... और अगर उसका बस चले तो वो खुद की उसकी सजा भी तय कर दे... जब मेरे मन में ऐसे कई सवाल खड़े होते हैं तो मैं अपने सहयोगियों को अपनी दुविधा बताती हूं... और हर बार मुझे यही जवाब मिलता है कि पब्लिक जो देखना चाहती है.. मीडिया वही दिखाती है... फिर क्यों पब्लिक मीडिया को कोसती है... अगर ऐसा है तो पब्लिक को इसका कोई हक नहीं... और अगर ऐसा नहीं तो ये वो पत्रकारिता नहीं जो हमें कोर्स करने के दौरान पढ़ाई जाती है... और जिसे पढ़ने के बाद ही हममें पत्रकारिता का भूत चढ़ता है... पत्रकारिता का अभी बहुत अनुभव तो मुझे नहीं है... लेकिन मैने जितना देखा है वो यही है कि आज की पत्रकारिता एक बिजनेस है... और इसके अलावा कुछ नहीं...

28 सितंबर, 2009

जीत की खुशी कितनी सही?





जीत की खुशी?

आज का दिन है असत्य पर सत्य की जीत का॥ आज के दिन भगवान राम ने रावण को मारकर असत्य पर जीत हासिल... और अधर्म की खात्मा हुआ था... कहने को तो आज भी हर साल जीत की खुशी मनाई जाती है॥ और असत्य यानि रावण का पुतला फूंका जाता है... लेकिन क्या वाकई इस पुतले को फूंकने के बाद असत्य समाप्त हो जाता है... बरसों पुरानी चली आ रही इस परंपरा को हम केवल परंपरा के रुप में ही मना रहे हैं॥ और हमेशा यूं ही मनाते रहेंगे... लेकिन आज की हकीकत तो ये है कि हर शहर गांव और मोहल्ले में ऐसे कई रावण हैं जिसने सामाज में गंद पैदा कर दी है॥ जरुरत है तो ऐसे रावणों का दहन करने की॥ जो आतंक के रुप में है.. या फिर लड़कियों और महिलाओं पर अत्याचार करने वाला शख्स भी रावण है... अमीरी का जोश लिए जो कानून ढेंगे पर लेकर घूमता है वो भी रावण है.. और वो भी रावण है जो कानून का रक्षक होते हुए भी दीमक की तरह कानून की तख्ती को चाट खाता है... और वो हर शख्स जो भ्रष्टाचार में लिप्त है रावण है... इन रावणों को खत्म कर सत्य की जीत नहीं होगी... बल्कि जरुरत है इनके अंदर उपजे रावण को खत्म करने की... जिससे भ्रष्टाचार, अत्याचार, हिंसा और अमीरी गरीबी की जड़ खत्म हो जाए... और हमारा देश भारत त्रेतायुग जैसा हो जाएगा... और देश में किसी विशेष समाज, व्यक्ति का राज नहीं बल्कि राम राज होगा...














13 सितंबर, 2009

संडे इज वर्किंग डे


कहते हैं संडे..... हॉली डे, फंन डे... लेकिन हम पत्रकारों की किस्मत में ये फन नहीं है... आज के दिन भी हमें ऑफिस आना पड़ता है... काम करना पड़ता है... ये अलग बात है कि आज कोई अधिकारी हमारे सर पर खड़ा होकर हमें ऑडर नहीं देता... और आज हम थोड़ा रिलैक्स होते हैं... लेकिन काम तो काम है... बुलेटिन भी जाएगा... खबरें भी आएंगी॥ उसे लिखना भी पड़ेगा और एडिट भी करवाना पड़ेगा... लेकिन इस काम में भी एक अलग ही मजा है... मुझे कभी इस बात का अफसोस नहीं होता कि हमें छुट्टियां नहीं मिलती... और न ही कभी इस बात का मलाल होता है कि जब सब लोग छुट्टियों का मजा लेते हैं... उस दरमियां हमारे पास सबसे ज्यादा काम होता है... खैर मलाल करें भी क्यों अपनी मर्जी से ही तो इस टीवी की दुनिया में कदम रखा था... काम करने मे मजा आता है... और खुशी की एक वजह ये भी है कि ऑफिस में हमारे में पूरा स्टाफ अच्छा है... सीनियर्स अच्छे हैं... और कुलीक भी दोस्त की तरह ही हैं... बस इसी बात की संतुष्टी है... खैर आज थोड़ा वक्त मिला तो ब्लॉक में हम बतिया लिए... चलो अब काम हो जाए... वरना मुझे ये लगेगा कि मैं अपने काम से बेइमानी कर रही हूं...

05 सितंबर, 2009

शिक्षक दिवस की बधाई

आज शिक्षक दिवस है.... और मुझे याद आ रहा है वो वक्त जब मैं स्कूल में पढ़ा करती थी... हफ्ते भर पहले से इस दिन की तैंयारियां शुरु हो जाती थी... अपनी क्लास टीचर को क्या गिफ्ट देना है... प्रोग्राम की तैंयारी करनी है... और भी बहत कुछ.... लेकिन वक्त के साथ साथ सब कुछ बदल गया... अब हम कोई भी दिवस मनाते हैं... तो वो भी खबरों के साथ... -फला-फला जगह शिक्षक दिवस मनाया गया... उस वक्त हम कई चीजों की अहमियत नहीं समझते थे... लेकिन वाकई आज मुझे वो सब दिन याद आते हैं... जिनके लिए आज हमारे पास या तो वक्त ही नहीं... या फिर वो लोग नहीं जिनके लिए या जिनके साथ हम वो दिन सैलिब्रेट करते हैं... मैं आज अपने सभी गुरुओं को इस ब्लॉक के जरिए शिक्षक दिवस की बहुत-बहुत बधाई देती हूं... साथ ही धन्यवाद करती हूं... उन सभी चीजों का जिनकी बदौलत आज मैं कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही हूं...