03 अगस्त, 2008


नन्ही कली

एक रात एक नन्ही कली मेरे पास आई थी


कहना चाहती थी कुछ पर कह ना पाई थी


सार्म्थय इतना ना बटोर सकी कि अपने भाव प्रकट कर सके


पर वो अपनी इच्छा रोक ना पई थी


कहने को तो शब्द भण्डार बहुत था,


लेकिन भाव भण्डार गृह खाली था।


तभी श्वेत का बीजारोपण हुआ


रात्री अपने ही अंधकार में डूबने वाली थी


कि छोटी कली पहले ही ओझल हो गई


वो कुछ कह ना पाई थी


क्योकिं वो इतना सार्म्थय बटोर ना पाई थी।


छोटी नहीं कली अपने को रोक ना पाई थी।


12 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

अपनी मन की पीड़ा को कविता में बहुत सुन्दरता से ढाला है।बधाई।

Vikash ने कहा…

"...श्वेत का बीजारोपण हुआ..."
बात कुछ समझ नहीं आयी. उत्कृष्ट शब्दों का चयन आपकी भाषा पर पकड़ प्रदर्शित करता है परंतु अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है. लिखते रहिये. :)

डा. अमर कुमार ने कहा…

.

ब्लागर व हिंदी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है,
कविता के भाव निःसंदेह ही बहुत व्याकुल कर देने वाले हैं ।

किंतु शब्दों का चयन लगता है, कुछ गड्ड-मड्ड हो गया है ।

Internet Existence ने कहा…

स्‍वागत है इंटरनेट की चमत्‍कारी दुनिया में

aspundir ने कहा…

मनोभावों का सुन्दर प्रदर्शन

36solutions ने कहा…

स्‍वागत

डा ’मणि ने कहा…

दीपिका जी
सादर अभिवादन
नये ब्लॉग के लिए पहले तो बहुत बधाई
मेरी अपनी एक कमी है की मैं औपचारिकताएं ज़्यादा नहीं पाता
इसलिए कहूँगा की , कविता के बधाव मे अभी गुंजाइश है,
हालाँकि मेरा सॉफ मानना है " जैसे खुशबू खराब कभी नहीं हो सकती वैसे ही कविता भी ."
पर इसमे आत्मा होनी चाहिए
विश्वास करता हूँ , आप इसे अन्यथा नहीं लेंगी ..

चलिए एक कविता भेज रहा हूँ देखिएगा

चाहता हूँ ........
एक ताजी गंध भर दूँ
इन हवाओं में.....

तोड़ लूँ
इस आम्र वन के
ये अनूठे बौर
पके महुए
आज मुट्ठी में
भरूं कुछ और
दूँ सुना
कोई सुवासित श्लोक फ़िर
मन की सभाओं में

आज प्राणों में उतारूँ
एक उजला गीत
भावनाओं में बिखेरूं
चित्रमय संगीत
खिलखिलाते फूल वाले
छंद भर दूँ
मृत हवाओं मैं .....................

आपकी सक्रिय प्रतिक्रिया कॅया इंतज़ार करूँगा
डॉ उदय 'मणि ' कौशिक
http://mainsamayhun.blogspot.com
umkaushik@gmail.com
094142-60806
684 महावीर नगर ईई
कोटा, राजस्थान

Sajeev ने कहा…

हिन्दी ब्लॉग्गिंग में आपका स्वागत हैं, निरंतर लिखें और हिन्दी को समृद्ध करें ....शुभकामनाओं सहित-
आपका मित्र
सजीव सारथी

रोशन प्रेमरोगी ने कहा…

bar-bar bachapan ki or lautana mujhe bhi achha lagata hai.
apki kavita adhoori hai ese poora kariya
-roshan premyogi

बेनामी ने कहा…

deepika ji, aap naye hai ye baat aapki kavita me jhalkati hai, subject achcha hai shabdon par abhi bahut mehnat karni hogi aapko, aapka atmvishwas dekhkar achcha laga,'abhi mujhe samandar ki jaroorat hai,fir samandar ko meri jaroorat hogi.' mai bhi blogger ki duniya me naya hu, asha karta hu aapki nayi kavita jald hi padhne ko milegi.

Amit K Sagar ने कहा…

बहतु खूब. लिखते रहिए. शुर्किया.
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यहाँ भी पधारे;
उल्टा तीर .

रोशन प्रेमरोगी ने कहा…

ap aur achha likhe
meri shubhkamana hia